26 May, 2007

वो चले आये

जब धीरे धीरे खिड़की से रात चली आयी,
और सन्नाटे ने अपनी चादर बिछाई,
तब कोई नही था मेरे पास,
एअक छोटा सा बल्ब था साथ ।
दरवाजे कि कुण्डी लगी थी,
मेरी डायरी भी टेबल पे पडी थी,
टेप रिकॉर्डर धीरे धीरे चल रह था,
कि इतने मै मै बत्ती चली गयी,
रात का एहसास भी ज्यादा होने लगा,
सन्नाटा भी अपनी गाथा कहने लगा,
ना कुण्डी खटकी ना आहट हुई,
नजाने कहॉ से वो चले आये,
इतने अँधेरे मै भी साफ नजर आये,
हडबडी मै हम उन्हें बिठा भी ना पाये,
और चले गए अपनी राम कहानी सुनाये...
आज ये हुआ - आज वो हुआ
हमने तुम्हारे बारे मै ये सोचा और ये किया,
वो थोडा मुस्कराये,
हमने भी अपने दात दिखाए,
कि
कि इतने मै बत्ती आ गयी ...
5/2/1995

3 comments:

sunita (shanoo) said...

वाह क्या कविता है..आप कविता में हास्य ढूँढ रहे थे क्या? मगर बहुत सुन्दर भाव है हमे थोड़ी हँसी भी आई जैसे इस पन्क्ति पर...

हमने भी अपने दात दिखाए,
कि
कि इतने मै बत्ती आ गयी
बहुत सुन्दर!

सुनीता(शानू)

Sharma ,Amit said...

कम शब्दों में सुंदर बात कहना तो आप से और रचना जी से सीखा जाये...

Sharma ,Amit said...

कम शब्दों में सुंदर बात कहना तो आप से और रचना जी से सीखा जाये...